परोपकार सच्चे मनुष्य की पहचान है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, परंतु सही मायने में उसी का जीवन सार्थक
होता है, जो दूसरों के लिए जीता है।
प्रकृति भी हमें परोपकार करना सिखाती है। वृक्ष पथिकों को छाया और फल देते हैं, पृथ्वी सबका बोझ उठाती है, फूल ख़ुशबू देते हैं और हमारे थके, हारे मन को प्रसन्न करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति भी किसी न किसी प्रकार से हमारा उद्धार ही करती है।
मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है। उसे तो परोपकार करना ही चाहीए। जो सुख दूसरों की सहायता करने से मिलता है वह अन्य किसी प्रकार से नहीं मिलता। ईश्वर ने यदी हमको काबिल बनाया है, तो हमारा यह कर्तव्य है कि हम दूसरों की सहायता करें।
पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, सभी किसी न किसी प्रकार से हमारे जीवन को सुगम और सफ़ल बनाते हैं। फिर हम तो मनुष्य हैं, ईश्वर ने हाथ, पैर के अतिरिक्त हमें ज्ञान भी दिया है। अतः हमें उस ज्ञान का प्रयोग करके, दूसरों के लिए भी जीना सीखना चाहिए।
परोपकार में ही असली सुख और शांति होती है। हमें अपना जीवन व्यर्थ में नष्ट नहीं करना चाहिये, बल्कि उसको परोपकार द्वारा सार्थक बनाना चाहिए।
पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।
राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।
यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’
राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।’
परोपकार हैं धर्म तेरा मानव जीव-दया हैं कर्म तेरा सबके रग में बसते राम नाम के आगे पहले कर्म हो तेरा।
होता है, जो दूसरों के लिए जीता है।
प्रकृति भी हमें परोपकार करना सिखाती है। वृक्ष पथिकों को छाया और फल देते हैं, पृथ्वी सबका बोझ उठाती है, फूल ख़ुशबू देते हैं और हमारे थके, हारे मन को प्रसन्न करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति भी किसी न किसी प्रकार से हमारा उद्धार ही करती है।
मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है। उसे तो परोपकार करना ही चाहीए। जो सुख दूसरों की सहायता करने से मिलता है वह अन्य किसी प्रकार से नहीं मिलता। ईश्वर ने यदी हमको काबिल बनाया है, तो हमारा यह कर्तव्य है कि हम दूसरों की सहायता करें।
पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, सभी किसी न किसी प्रकार से हमारे जीवन को सुगम और सफ़ल बनाते हैं। फिर हम तो मनुष्य हैं, ईश्वर ने हाथ, पैर के अतिरिक्त हमें ज्ञान भी दिया है। अतः हमें उस ज्ञान का प्रयोग करके, दूसरों के लिए भी जीना सीखना चाहिए।
परोपकार में ही असली सुख और शांति होती है। हमें अपना जीवन व्यर्थ में नष्ट नहीं करना चाहिये, बल्कि उसको परोपकार द्वारा सार्थक बनाना चाहिए।
पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।
राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।
यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’
राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।’
परोपकार हैं धर्म तेरा मानव जीव-दया हैं कर्म तेरा सबके रग में बसते राम नाम के आगे पहले कर्म हो तेरा।
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